श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.23

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

सुनन्दनन्दावूचतुः

भो भो राजन् सुभद्रं ते वाचं नोऽवहितः शृणु।

यः पंचवर्षस्तपसा भवान्देवमतीतृपत्॥ २३

bho bho rājan subhadraṃ te vācaṃ no'vahitaḥ śṛṇu|

yaḥ paṃcavarṣastapasā bhavāndevamatītṛpat|| 23

अर्थ

सुनन्द और नन्द कहने लगे—राजन्! आपका कल्याण हो, आप सावधान होकर हमारी बात सुनिये। आपने पाँच वर्षकी अवस्थामें ही तपस्या करके सर्वेश्‍वर भगवान्‌को प्रसन्‍न कर लिया था॥ २३॥✎ 382 1326

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #382 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #1326 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पुण्यश्लोक-शिखामणि → पुण्यश्लोकशिखामणि

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