श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.39

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

गम्भीरवेगोऽनिमिषं ज्योतिषां चक्रमाहितम्।

यस्मिन् भ्रमति कौरव्य मेढ्यामिव गवां गणः॥ ३९

gambhīravego'nimiṣaṃ jyotiṣāṃ cakramāhitam|

yasmin bhramati kauravya meḍhyāmiva gavāṃ gaṇaḥ|| 39

अर्थ

कुरुनन्दन! जिस प्रकार दायँ चलानेके समय खम्भेके चारों ओर बैल घूमते हैं, उसी प्रकार यह गम्भीर वेगवाला ज्योतिश्‍चक्र उस अविनाशी लोकके आश्रय ही निरन्तर घूमता रहता है॥ ३९॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें