श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.42

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

यः पंचवर्षो गुरुदारवाक्शरै-

र्भिन्‍नेन यातो हृदयेन दूयता।

वनं मदादेशकरोऽजितं प्रभुं

जिगाय तद्भक्तगुणैः पराजितम्॥ ४२

yaḥ paṃcavarṣo gurudāravākśarai-

rbhinnena yāto hṛdayena dūyatā|

vanaṃ madādeśakaro'jitaṃ prabhuṃ

jigāya tadbhaktaguṇaiḥ parājitam|| 42

अर्थ

अहो! वे पाँच वर्षकी अवस्थामें ही सौतेली माताके वाग्बाणोंसे मर्माहत होकर दुःखी हृदयसे वनमें चले गये और मेरे उपदेशके अनुसार आचरण करके ही उन अजेय प्रभुको जीत लिया, जो केवल अपने भक्तोंके गुणोंसे ही वशमें होते हैं॥ ४२॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें