ध्रुवजीने तो पाँच-छः वर्षकी अवस्थामें कुछ दिनोंकी तपस्यासे ही भगवान्को प्रसन्न करके उनका परमपद प्राप्त कर लिया; किन्तु उनके अधिकृत किये हुए इस पदको भूमण्डलमें कोई दूसरा क्षत्रिय क्या वर्षोंतक तपस्या करके भी पा सकता है?॥ ४३॥✎ 383
यः क्षत्रबन्धुर्भुवि तस्याधिरूढ-
मन्वारुरुक्षेदपि वर्षपूगैः।
षट्पंचवर्षो यदहोभिरल्पैः
प्रसाद्य वैकुण्ठमवाप तत्पदम्॥ ४३
ध्रुवजीने तो पाँच-छः वर्षकी अवस्थामें कुछ दिनोंकी तपस्यासे ही भगवान्को प्रसन्न करके उनका परमपद प्राप्त कर लिया; किन्तु उनके अधिकृत किये हुए इस पदको भूमण्डलमें कोई दूसरा क्षत्रिय क्या वर्षोंतक तपस्या करके भी पा सकता है?॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.12.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 472) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/43/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)