श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.13.25

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

अंगोऽश्‍वमेधं राजर्षिराजहार महाक्रतुम्।

नाजग्मुर्देवतास्तस्मिन्‍नाहूता ब्रह्मवादिभिः॥ २५

aṃgo'śvamedhaṃ rājarṣirājahāra mahākratum|

nājagmurdevatāstasminnāhūtā brahmavādibhiḥ|| 25

अर्थ

श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी! एक बार राजर्षि अंगने अश्‍वमेध-महायज्ञका अनुष्ठान किया। उसमें वेदवादी ब्राह्मणोंके आवाहन करनेपर भी देवतालोग अपना भाग लेने नहीं आये॥ २५॥

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