श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.13.34

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तांस्तान् कामान् हरिर्दद्याद्यान् यान् कामयते जनः।

आराधितो यथैवैष तथा पुंसां फलोदयः॥ ३४✎ 1886

tāṃstān kāmān harirdadyādyān yān kāmayate janaḥ|

ārādhito yathaivaiṣa tathā puṃsāṃ phalodayaḥ|| 34

अर्थ

भक्त जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, श्रीहरि उसे वही-वही पदार्थ देते हैं। उनकी जिस प्रकार आराधना की जाती है उसी प्रकार उपासकको फल भी मिलता है॥ ३४॥✎ 1601

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1601 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सर्वगुण-सम्पन्‍न → सर्वगुणसम्पन्‍न
  • #1886 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): तथैवैष यथा → यथैवैष तथा

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