भक्त जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, श्रीहरि उसे वही-वही पदार्थ देते हैं। उनकी जिस प्रकार आराधना की जाती है उसी प्रकार उपासकको फल भी मिलता है॥ ३४॥✎ 1601
तांस्तान् कामान् हरिर्दद्याद्यान् यान् कामयते जनः।
आराधितो यथैवैष तथा पुंसां फलोदयः॥ ३४
भक्त जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, श्रीहरि उसे वही-वही पदार्थ देते हैं। उनकी जिस प्रकार आराधना की जाती है उसी प्रकार उपासकको फल भी मिलता है॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.13.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 476) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/13/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)