॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.13.44
यतः पापीयसी कीर्तिरधर्मश्च महान्नृणाम्।
यतो विरोधः सर्वेषां यत आधिरनन्तकः॥ ४४
yataḥ pāpīyasī kīrtiradharmaśca mahānnṛṇām|
yato virodhaḥ sarveṣāṃ yata ādhiranantakaḥ|| 44
अर्थ
जिसकी करनीसे माता-पिताका सारा सुयश मिट्टीमें मिल जाय, उन्हें अधर्मका भागी होना पड़े, सबसे विरोध हो जाय, कभी न छूटनेवाली चिन्ता मोल लेनी पड़े और घर भी दुःखदायी हो जाय—ऐसी नाममात्रकी सन्तानके लिये कौन समझदार पुरुष ललचावेगा? वह तो आत्माके लिये एक प्रकारका मोहमय बन्धन ही है॥ ४४-४५॥