॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.13.45
कस्तं प्रजापदेशं वै मोहबन्धनमात्मनः।
पण्डितो बहु मन्येत यदर्थाः क्लेशदा गृहाः॥ ४५
kastaṃ prajāpadeśaṃ vai mohabandhanamātmanaḥ|
paṇḍito bahu manyeta yadarthāḥ kleśadā gṛhāḥ|| 45
अर्थ
जिसकी करनीसे माता-पिताका सारा सुयश मिट्टीमें मिल जाय, उन्हें अधर्मका भागी होना पड़े, सबसे विरोध हो जाय, कभी न छूटनेवाली चिन्ता मोल लेनी पड़े और घर भी दुःखदायी हो जाय—ऐसी नाममात्रकी सन्तानके लिये कौन समझदार पुरुष ललचावेगा? वह तो आत्माके लिये एक प्रकारका मोहमय बन्धन ही है॥ ४४-४५॥