rakṣan yathā baliṃ gṛhṇanniha pretya ca modate|| 17
अर्थ
जो राजा दुष्ट मन्त्री और चोर आदिसे अपनी प्रजाकी रक्षा करते हुए न्यायानुकूल कर लेता है, वह इस लोकमें और परलोकमें दोनों जगह सुख पाता है॥ १७॥
राजन्नसाध्वमात्येभ्यश्चोरादिभ्यः प्रजा नृपः।
रक्षन् यथा बलिं गृह्णन्निह प्रेत्य च मोदते॥ १७
जो राजा दुष्ट मन्त्री और चोर आदिसे अपनी प्रजाकी रक्षा करते हुए न्यायानुकूल कर लेता है, वह इस लोकमें और परलोकमें दोनों जगह सुख पाता है॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 479) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/17/