अरे! जिसमें तुमलोगोंकी इतनी भक्ति है, वह यज्ञपुरुष है कौन? यह तो ऐसी ही बात हुई जैसे कुलटा स्त्रियाँ अपने विवाहित पतिसे प्रेम न करके किसी परपुरुषमें आसक्त हो जायँ॥ २५॥
को यज्ञपुरुषो नाम यत्र वो भक्तिरीदृशी।
भर्तृस्नेहविदूराणां यथा जारे कुयोषिताम्॥ २५
अरे! जिसमें तुमलोगोंकी इतनी भक्ति है, वह यज्ञपुरुष है कौन? यह तो ऐसी ही बात हुई जैसे कुलटा स्त्रियाँ अपने विवाहित पतिसे प्रेम न करके किसी परपुरुषमें आसक्त हो जायँ॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 480) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/25/