वह ऐश्वर्यमदसे अंधा हो रथपर चढ़कर निरंकुश गजराजके समान पृथ्वी और आकाशको कँपाता हुआ सर्वत्र विचरने लगा॥ ५॥
एवं मदान्ध उत्सिक्तो निरङ्कुश इव द्विपः।
पर्यटन् रथमास्थाय कम्पयन्निव रोदसी॥ ५
वह ऐश्वर्यमदसे अंधा हो रथपर चढ़कर निरंकुश गजराजके समान पृथ्वी और आकाशको कँपाता हुआ सर्वत्र विचरने लगा॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 478) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/5/