na yaṣṭavyaṃ na dātavyaṃ na hotavyaṃ dvijāḥ kvacit|
iti nyavārayaddharmaṃ bherīghoṣeṇa sarvaśaḥ|| 6
अर्थ
‘कोई भी द्विजातिय वर्णका पुरुष कभी किसी प्रकारका यज्ञ, दान और हवन न करे’ अपने राज्यमें यह ढिंढोरा पिटवाकर उसने सारे धर्म-कर्म बंद करवा दिये॥ ६॥
न यष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं द्विजाः क्वचित्।
इति न्यवारयद्धर्मं भेरीघोषेण सर्वशः॥ ६
‘कोई भी द्विजातिय वर्णका पुरुष कभी किसी प्रकारका यज्ञ, दान और हवन न करे’ अपने राज्यमें यह ढिंढोरा पिटवाकर उसने सारे धर्म-कर्म बंद करवा दिये॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 478) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/6/