श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.7

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

वेनस्यावेक्ष्य मुनयो दुर्वृत्तस्य विचेष्टितम्।

विमृश्य लोकव्यसनं कृपयोचुः स्म सत्रिणः॥ ७

venasyāvekṣya munayo durvṛttasya viceṣṭitam|

vimṛśya lokavyasanaṃ kṛpayocuḥ sma satriṇaḥ|| 7

अर्थ

दुष्ट वेनका ऐसा अत्याचार देख सारे ऋषि-मुनि एकत्र हुए और संसारपर संकट आया समझकर करुणावश आपसमें कहने लगे॥ ७॥✎ 1602

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1602 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: समझ-कर → समझकर

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