श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.15.2

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तद् दृष्ट्वा मिथुनं जातमृषयो ब्रह्मवादिनः।

ऊचुः परमसन्तुष्टा विदित्वा भगवत्कलाम्॥ २

tad dṛṣṭvā mithunaṃ jātamṛṣayo brahmavādinaḥ|

ūcuḥ paramasantuṣṭā viditvā bhagavatkalām|| 2

अर्थ

ब्रह्मवादी ऋषि उस जोड़ेको उत्पन्‍न हुआ देख और उसे भगवान्‌का अंश जान बहुत प्रसन्‍न हुए और बोले॥ २॥

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