श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.15.3

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

ऋषय ऊचुः

एष विष्णोर्भगवतः कला भुवनपालिनी।

इयं च लक्ष्म्याः सम्भूतिः पुरुषस्यानपायिनी॥ ३

eṣa viṣṇorbhagavataḥ kalā bhuvanapālinī|

iyaṃ ca lakṣmyāḥ sambhūtiḥ puruṣasyānapāyinī|| 3

अर्थ

ऋषियोंने कहा—यह पुरुष भगवान् विष्णुकी विश्‍वपालिनी कलासे प्रकट हुआ है और यह स्त्री उन परम पुरुषकी अनपायिनी (कभी अलग न होनेवाली) शक्ति लक्ष्मीजीका अवतार है॥ ३॥✎ 390 1997

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #390 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1997 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): दाँतोवाली → दाँतोंवाली

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