तब उन स्तुति करनेवालोंका अभिप्राय समझकर वेनपुत्र परम प्रतापी महाराज पृथुने हँसते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा॥ २१॥✎ 391
स्तावकांस्तानभिप्रेत्य पृथुर्वैन्यः प्रतापवान्।
मेघनिर्ह्रादया वाचा प्रहसन्निदमब्रवीत्॥ २१
तब उन स्तुति करनेवालोंका अभिप्राय समझकर वेनपुत्र परम प्रतापी महाराज पृथुने हँसते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.15.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 484) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#391 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् ने → विष्णुभगवान्ने