भोः सूत हे५ मागध सौम्य वन्दिँ- ल्लोकेऽधुनास्पष्टगुणस्य मे स्यात्।
किमाश्रयो मे स्तव एष योज्यतां
मा मय्यभूवन् वितथा गिरो वः॥ २२
bhoḥ sūta he māgadha saumya vandim̐-
lloke'dhunāspaṣṭaguṇasya me syāt|
kimāśrayo me stava eṣa yojyatāṃ
mā mayyabhūvan vitathā giro vaḥ|| 22
अर्थ
पृथुने कहा—सौम्य सूत, मागध और वन्दीजन! अभी तो लोकमें मेरा कोई भी गुण प्रकट नहीं हुआ। फिर तुम किन गुणोंको लेकर मेरी स्तुति करोगे? मेरे विषयमें तुम्हारी वाणी व्यर्थ नहीं होनी चाहिये। इसलिये मुझसे भिन्न किसी औरकी स्तुति करो॥ २२॥
भोः सूत हे मागध सौम्य वन्दिँ-
ल्लोकेऽधुनास्पष्टगुणस्य मे स्यात्।
किमाश्रयो मे स्तव एष योज्यतां
मा मय्यभूवन् वितथा गिरो वः॥ २२
पृथुने कहा—सौम्य सूत, मागध और वन्दीजन! अभी तो लोकमें मेरा कोई भी गुण प्रकट नहीं हुआ। फिर तुम किन गुणोंको लेकर मेरी स्तुति करोगे? मेरे विषयमें तुम्हारी वाणी व्यर्थ नहीं होनी चाहिये। इसलिये मुझसे भिन्न किसी औरकी स्तुति करो॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.15.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 484) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/22/