॥ श्रीहरिः ॥
मातृभक्तिः परस्त्रीषु पत्न्यामर्ध इवात्मनः।
प्रजासु पितृवत्स्निग्धः किङ्करो ब्रह्मवादिनाम्॥ १७
mātṛbhaktiḥ parastrīṣu patnyāmardha ivātmanaḥ|
prajāsu pitṛvatsnigdhaḥ kiṅkaro brahmavādinām|| 17
अर्थ
ये परस्त्रीमें माताके समान भक्ति रखेंगे, पत्नीको अपने आधे अंगके समान मानेंगे, प्रजापर पिताके समान प्रेम रखेंगे और ब्रह्मवादियोंके सेवक होंगे॥ १७॥
मातृभक्तिः परस्त्रीषु पत्न्यामर्ध इवात्मनः।
प्रजासु पितृवत्स्निग्धः किङ्करो ब्रह्मवादिनाम्॥ १७
ये परस्त्रीमें माताके समान भक्ति रखेंगे, पत्नीको अपने आधे अंगके समान मानेंगे, प्रजापर पिताके समान प्रेम रखेंगे और ब्रह्मवादियोंके सेवक होंगे॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.16.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 487) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/16/17/