दूसरे प्राणी इन्हें उतना ही चाहेंगे जितना अपने शरीरको। ये सुहृदोंके आनन्दको बढ़ायेंगे। ये सर्वदा वैराग्यवान् पुरुषोंसे विशेष प्रेम करेंगे और दुष्टोंको दण्डपाणि यमराजके समान सदा दण्ड देनेके लिये उद्यत रहेंगे॥ १८॥
देहिनामात्मवत्प्रेष्ठः सुहृदां नन्दिवर्धनः।
मुक्तसंगप्रसंगोऽयं दण्डपाणिरसाधुषु॥ १८
दूसरे प्राणी इन्हें उतना ही चाहेंगे जितना अपने शरीरको। ये सुहृदोंके आनन्दको बढ़ायेंगे। ये सर्वदा वैराग्यवान् पुरुषोंसे विशेष प्रेम करेंगे और दुष्टोंको दण्डपाणि यमराजके समान सदा दण्ड देनेके लिये उद्यत रहेंगे॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.16.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 487) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/16/18/