श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.16.19

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अयं तु साक्षाद्भगवांस्त्र्यधीशः

कूटस्थ आत्मा कलयावतीर्णः।

यस्मिन्‍नविद्यारचितं निरर्थकं

पश्यन्ति नानात्वमपि प्रतीतम्॥ १९

ayaṃ tu sākṣādbhagavāṃstryadhīśaḥ

kūṭastha ātmā kalayāvatīrṇaḥ|

yasminnavidyāracitaṃ nirarthakaṃ

paśyanti nānātvamapi pratītam|| 19

अर्थ

‘तीनों गुणोंके अधिष्ठाता और निर्विकार साक्षात् श्रीनारायणने ही इनके रूपमें अपने अंशसे अवतार लिया है, जिनमें पण्डितलोग अविद्यावश प्रतीत होनेवाले इस नानात्वको मिथ्या ही समझते हैं॥ १९॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें