श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.16.23

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

विस्फूर्जयन्‍नाजगवं धनुः स्वयं

यदाचरत्क्ष्मामविषह्यमाजौ ।

तदा निलिल्युर्दिशि दिश्यसन्तो

लाङ्गूलमुद्यम्य यथा मृगेन्द्रः॥ २३

visphūrjayannājagavaṃ dhanuḥ svayaṃ

yadācaratkṣmāmaviṣahyamājau |

tadā nililyurdiśi diśyasanto

lāṅgūlamudyamya yathā mṛgendraḥ|| 23

अर्थ

रणभूमिमें कोई भी इनका वेग नहीं सह सकेगा। जिस समय ये जंगलमें पूँछ उठाकर विचरते हुए सिंहके समान अपने ‘आजगव’ धनुषका टंकार करते हुए भूमण्डलमें विचरेंगे, उस समय सभी दुष्टजन इधर-उधर छिप जायँगे॥ २३॥✎ 1604

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1604 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बातों-की-बातमें → बातोंकी-बातमें

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