श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.16.8

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

देवेऽवर्षत्यसौ देवो नरदेववपुर्हरिः।

कृच्छ्रप्राणाः प्रजा ह्येष रक्षिष्यत्यंजसेन्द्रवत्॥ ८

deve'varṣatyasau devo naradevavapurhariḥ|

kṛcchraprāṇāḥ prajā hyeṣa rakṣiṣyatyaṃjasendravat|| 8

अर्थ

कभी वर्षा न होगी और प्रजाके प्राण संकटमें पड़ जायँगे, तो ये राजवेषधारी श्रीहरि इन्द्रकी भाँति जल बरसाकर अनायास ही उसकी रक्षा कर लेंगे॥ ८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें