श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.12

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

पृथुः प्रजानां करुणं निशम्य परिदेवितम्।

दीर्घं दध्यौ कुरुश्रेष्ठ निमित्तं सोऽन्वपद्यत॥ १२

pṛthuḥ prajānāṃ karuṇaṃ niśamya paridevitam|

dīrghaṃ dadhyau kuruśreṣṭha nimittaṃ so'nvapadyata|| 12

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—कुरुवर! प्रजाका करुणक्रन्दन सुनकर महाराज पृथु बहुत देरतक विचार करते रहे। अन्तमें उन्हें अन्‍नाभावका कारण मालूम हो गया॥ १२॥

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