यह देखकर महाराज पृथुकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वे जहाँ-जहाँ पृथ्वी गयी, वहाँ-वहाँ धनुषपर बाण चढ़ाये उसके पीछे लगे रहे॥ १५॥✎ 1329
तामन्वधावत्तद्वैन्यः कुपितोऽत्यरुणेक्षणः।
शरं धनुषि संधाय यत्र यत्र पलायते॥ १५
यह देखकर महाराज पृथुकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वे जहाँ-जहाँ पृथ्वी गयी, वहाँ-वहाँ धनुषपर बाण चढ़ाये उसके पीछे लगे रहे॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.17.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 490) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/17/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1329 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): शरणा-गतवत्सल → शरणागतवत्सल