जो दुष्ट अपना ही पोषण करनेवाला तथा अन्य प्राणियोंके प्रति निर्दय हो—वह पुरुष, स्त्री अथवा नपुंसक कोई भी हो—उसका मारना राजाओंके लिये न मारनेके ही समान है॥ २६॥✎ 393394395396397398399
पुमान् योषिदुत क्लीब आत्मसम्भावनोऽधमः।
भूतेषु निरनुक्रोशो नृपाणां तद्वधोऽवधः॥ २६
जो दुष्ट अपना ही पोषण करनेवाला तथा अन्य प्राणियोंके प्रति निर्दय हो—वह पुरुष, स्त्री अथवा नपुंसक कोई भी हो—उसका मारना राजाओंके लिये न मारनेके ही समान है॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.17.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 491) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/17/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (7)