श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.27

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

त्वां स्तब्धां दुर्मदां नीत्वा मायागां तिलशः शरैः।

आत्मयोगबलेनेमा धारयिष्याम्यहं प्रजाः॥ २७

tvāṃ stabdhāṃ durmadāṃ nītvā māyāgāṃ tilaśaḥ śaraiḥ|

ātmayogabalenemā dhārayiṣyāmyahaṃ prajāḥ|| 27

अर्थ

तू बड़ी गर्वीली और मदोन्मत्ता है; इस समय मायासे ही यह गौका रूप बनाये हुए है। मैं बाणोंसे तेरे टुकड़े-टुकड़े करके अपने योगबलसे प्रजाको धारण करूँगा॥ २७॥✎ 393 394 395 396 397 398 399

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (7)
  • #393 शब्दोंके बीचका स्थान: जोदुष्ट → जो दुष्ट
  • #394 शब्दोंके बीचका स्थान: गर्भसेनिकालती → गर्भसे निकालती
  • #395 शब्दोंके बीचका स्थान: कियेहुए → किये हुए
  • #396 शब्दोंके बीचका स्थान: करनेपरतुझे → करनेपर तुझे
  • #397 शब्दोंके बीचका स्थान: औरअपने → और अपने
  • #398 शब्दोंके बीचका स्थान: तूजो → तू जो
  • #399 शब्दोंके बीचका स्थान: भागतो → भाग तो

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