तू बड़ी गर्वीली और मदोन्मत्ता है; इस समय मायासे ही यह गौका रूप बनाये हुए है। मैं बाणोंसे तेरे टुकड़े-टुकड़े करके अपने योगबलसे प्रजाको धारण करूँगा॥ २७॥✎ 393394395396397398399
त्वां स्तब्धां दुर्मदां नीत्वा मायागां तिलशः शरैः।
आत्मयोगबलेनेमा धारयिष्याम्यहं प्रजाः॥ २७
तू बड़ी गर्वीली और मदोन्मत्ता है; इस समय मायासे ही यह गौका रूप बनाये हुए है। मैं बाणोंसे तेरे टुकड़े-टुकड़े करके अपने योगबलसे प्रजाको धारण करूँगा॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.17.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 491) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/17/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (7)