श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस समय महाराज पृथुके होठ क्रोधसे काँप रहे थे। उनकी इस प्रकार स्तुति कर पृथ्वीने अपने हृदयको विचारपूर्वक समाहित किया और डरते-डरते उनसे कहा॥ १॥
इत्थं पृथुमभिष्टूय रुषा प्रस्फुरिताधरम्।
पुनराहावनिर्भीता संस्तभ्यात्मानमात्मना॥ १
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस समय महाराज पृथुके होठ क्रोधसे काँप रहे थे। उनकी इस प्रकार स्तुति कर पृथ्वीने अपने हृदयको विचारपूर्वक समाहित किया और डरते-डरते उनसे कहा॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.18.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 493) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/18/1/