‘प्रभो! आप अपना क्रोध शान्त कीजिये और मैं जो प्रार्थना करती हूँ, उसे ध्यान देकर सुनिये। बुद्धिमान् पुरुष भ्रमरके समान सभी जगहसे सार ग्रहण कर लेते हैं॥ २॥
संनियच्छाभिभो मन्युं निबोध श्रावितं च मे।
सर्वतः सारमादत्ते यथा मधुकरो बुधः॥ २
‘प्रभो! आप अपना क्रोध शान्त कीजिये और मैं जो प्रार्थना करती हूँ, उसे ध्यान देकर सुनिये। बुद्धिमान् पुरुष भ्रमरके समान सभी जगहसे सार ग्रहण कर लेते हैं॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.18.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 493) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/18/2/