श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.18.2

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

संनियच्छाभिभो मन्युं१ निबोध श्रावितं च मे।

सर्वतः सारमादत्ते यथा मधुकरो बुधः॥ २

saṃniyacchābhibho manyuṃ nibodha śrāvitaṃ ca me|

sarvataḥ sāramādatte yathā madhukaro budhaḥ|| 2

अर्थ

‘प्रभो! आप अपना क्रोध शान्त कीजिये और मैं जो प्रार्थना करती हूँ, उसे ध्यान देकर सुनिये। बुद्धिमान् पुरुष भ्रमरके समान सभी जगहसे सार ग्रहण कर लेते हैं॥ २॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—क्रोधं।

    (मुद्रित पृष्ठ 493)

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