श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.18.32

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

प्राक्पृथोरिह नैवैषा पुरग्रामादिकल्पना।

यथासुखं वसन्ति स्म तत्र तत्राकुतोभयाः॥ ३२

prākpṛthoriha naivaiṣā puragrāmādikalpanā|

yathāsukhaṃ vasanti sma tatra tatrākutobhayāḥ|| 32

अर्थ

महाराज पृथुसे पहले इस पृथ्वीतलपर पुर-ग्रामादिका विभाग नहीं था; सब लोग अपने-अपने सुभीतेके अनुसार बेखटके जहाँ-तहाँ बस जाते थे॥ ३२॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पृथुविजयेऽष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥

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