प्राक्पृथोरिह नैवैषा पुरग्रामादिकल्पना।
यथासुखं वसन्ति स्म तत्र तत्राकुतोभयाः॥ ३२
महाराज पृथुसे पहले इस पृथ्वीतलपर पुर-ग्रामादिका विभाग नहीं था; सब लोग अपने-अपने सुभीतेके अनुसार बेखटके जहाँ-तहाँ बस जाते थे॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.18.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 496) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/18/32/