श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.18.5

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

ताननादृत्य यो विद्वानर्थानारभते स्वयम्।

तस्य व्यभिचरन्त्यर्था आरब्धाश्‍च३ पुनः पुनः॥ ५

tānanādṛtya yo vidvānarthānārabhate svayam|

tasya vyabhicarantyarthā ārabdhāśca punaḥ punaḥ|| 5

अर्थ

परन्तु जो अज्ञानी पुरुष उनका अनादर करके अपने मनःकल्पित उपायोंका आश्रय लेता है, उसके सभी उपाय और प्रयत्न बार-बार निष्फल होते रहते हैं॥ ५॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—प्रारब्धा०।

    (मुद्रित पृष्ठ 493)

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