जिस समय महाराज पृथु अन्तिम यज्ञद्वारा भगवान् यज्ञपतिकी आराधना कर रहे थे, इन्द्रने ईर्ष्यावश गुप्तरूपसे उनके यज्ञका घोड़ा हर लिया॥ ११॥
चरमेणाश्वमेधेन यजमाने यजुष्पतिम्।
वैन्ये यज्ञपशुं स्पर्धन्नपोवाह तिरोहितः॥ ११
जिस समय महाराज पृथु अन्तिम यज्ञद्वारा भगवान् यज्ञपतिकी आराधना कर रहे थे, इन्द्रने ईर्ष्यावश गुप्तरूपसे उनके यज्ञका घोड़ा हर लिया॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 497) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/19/11/