श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.12

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

तमत्रिर्भगवानैक्षत्त्वरमाणं विहायसा।

आमुक्तमिव पाखण्डं योऽधर्मे धर्मविभ्रमः॥ १२

tamatrirbhagavānaikṣattvaramāṇaṃ vihāyasā|

āmuktamiva pākhaṇḍaṃ yo'dharme dharmavibhramaḥ|| 12

अर्थ

इन्द्रने अपनी रक्षाके लिये कवचरूपसे पाखण्डवेष धारण कर लिया था, जो अधर्ममें धर्मका भ्रम उत्पन्‍न करनेवाला है—जिसका आश्रय लेकर पापी पुरुष भी धर्मात्मा-सा जान पड़ता है। इस वेषमें वे घोड़ेको लिये बड़ी शीघ्रतासे आकाशमार्गसे जा रहे थे कि उनपर भगवान् अत्रिकी दृष्टि पड़ गयी। उनके कहनेसे महाराज पृथुका महारथी पुत्र इन्द्रको मारनेके लिये उनके पीछे दौड़ा और बड़े क्रोधसे बोला, ‘अरे खड़ा रह! खड़ा रह’॥ १२-१३॥

यह अर्थ श्लोक 12–13 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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