॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.19.13
अत्रिणा चोदितो१ हन्तुं पृथुपुत्रो महारथः।
अन्वधावत संक्रुद्धस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत्॥ १३
atriṇā codito hantuṃ pṛthuputro mahārathaḥ|
anvadhāvata saṃkruddhastiṣṭha tiṣṭheti cābravīt|| 13
अर्थ
इन्द्रने अपनी रक्षाके लिये कवचरूपसे पाखण्डवेष धारण कर लिया था, जो अधर्ममें धर्मका भ्रम उत्पन्न करनेवाला है—जिसका आश्रय लेकर पापी पुरुष भी धर्मात्मा-सा जान पड़ता है। इस वेषमें वे घोड़ेको लिये बड़ी शीघ्रतासे आकाशमार्गसे जा रहे थे कि उनपर भगवान् अत्रिकी दृष्टि पड़ गयी। उनके कहनेसे महाराज पृथुका महारथी पुत्र इन्द्रको मारनेके लिये उनके पीछे दौड़ा और बड़े क्रोधसे बोला, ‘अरे खड़ा रह! खड़ा रह’॥ १२-१३॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—सूचितं।