यह देखकर भगवान् इन्द्रको विचार हुआ कि इस प्रकार तो पृथुके कर्म मेरे कर्मोंकी अपेक्षा भी बढ़ जायँगे। इसलिये वे उनके यज्ञमहोत्सवको सहन न कर सके॥ २॥✎ 401
तदभिप्रेत्य भगवान् कर्मातिशयमात्मनः।
शतक्रतुर्न ममृषे पृथोर्यज्ञमहोत्सवम्॥ २
यह देखकर भगवान् इन्द्रको विचार हुआ कि इस प्रकार तो पृथुके कर्म मेरे कर्मोंकी अपेक्षा भी बढ़ जायँगे। इसलिये वे उनके यज्ञमहोत्सवको सहन न कर सके॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 496) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/19/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)