विदुरजी! यजमानसे इस प्रकार सलाह करके उसके याजकोंने क्रोधपूर्वक इन्द्रका आवाहन किया। वे स्रुवाद्वारा आहुति डालना ही चाहते थे कि ब्रह्माजीने वहाँ आकर उन्हें रोक दिया॥ २९॥✎ 404
इत्यामन्त्र्य क्रतुपतिं विदुरास्यर्त्विजो रुषा।
स्रुग्घस्तांजुह्वतोऽभ्येत्य स्वयम्भूः प्रत्यषेधत॥ २९
विदुरजी! यजमानसे इस प्रकार सलाह करके उसके याजकोंने क्रोधपूर्वक इन्द्रका आवाहन किया। वे स्रुवाद्वारा आहुति डालना ही चाहते थे कि ब्रह्माजीने वहाँ आकर उन्हें रोक दिया॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 499) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/19/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)