॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.19.30
न वध्यो भवतामिन्द्रो यद्यज्ञो भगवत्तनुः।
यं जिघांसथ यज्ञेन यस्येष्टास्तनवः सुराः॥ ३०
na vadhyo bhavatāmindro yadyajño bhagavattanuḥ|
yaṃ jighāṃsatha yajñena yasyeṣṭāstanavaḥ surāḥ|| 30
अर्थ
वे बोले, ‘याजको! तुम्हें इन्द्रका वध नहीं करना चाहिये, यह यज्ञसंज्ञक इन्द्र तो भगवान्की ही मूर्ति है। तुम यज्ञद्वारा जिन देवताओंकी आराधना कर रहे हो, वे इन्द्रके ही तो अंग हैं और उसे तुम यज्ञद्वारा मारना चाहते हो॥ ३०॥✎ 404