श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.31

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

तदिदं पश्यत महद्धर्मव्यतिकरं द्विजाः।

इन्द्रेणानुष्ठितं राज्ञः कर्मैतद्विजिघांसता॥ ३१

tadidaṃ paśyata mahaddharmavyatikaraṃ dvijāḥ|

indreṇānuṣṭhitaṃ rājñaḥ karmaitadvijighāṃsatā|| 31

अर्थ

पृथुके इस यज्ञानुष्ठानमें विघ्न डालनेके लिये इन्द्रने जो पाखण्ड फैलाया है, वह धर्मका उच्छेदन करनेवाला है। इस बातपर तुम ध्यान दो, अब उससे अधिक विरोध मत करो; नहीं तो वह और भी पाखण्ड मार्गोंका प्रचार करेगा॥ ३१॥✎ 404

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #404 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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