जरा देखिये तो, जो इन्द्र घोड़ेको चुराकर आपके यज्ञमें विघ्न डाल रहा था, उसीके रचे हुए इन मनोहर पाखण्डोंकी ओर सारी जनता खिंचती चली जा रही है॥ ३६॥✎ 404
एभिरिन्द्रोपसंसृष्टैः पाखण्डैर्हारिभिर्जनम्।
ह्रियमाणं विचक्ष्वैनं यस्ते यज्ञध्रुगश्वमुट्॥ ३६
जरा देखिये तो, जो इन्द्र घोड़ेको चुराकर आपके यज्ञमें विघ्न डाल रहा था, उसीके रचे हुए इन मनोहर पाखण्डोंकी ओर सारी जनता खिंचती चली जा रही है॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 499) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/19/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)