श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.5

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

सिद्धा विद्याधरा दैत्या दानवा गुह्यकादयः।

सुनन्दनन्दप्रमुखाः पार्षदप्रवरा हरेः॥ ५

siddhā vidyādharā daityā dānavā guhyakādayaḥ|

sunandanandapramukhāḥ pārṣadapravarā hareḥ|| 5

अर्थ

सिद्ध, विद्याधर, दैत्य, दानव, यक्ष, सुनन्द-नन्दादि भगवान्‌के प्रमुख पार्षद और जो सर्वदा भगवान्‌की सेवाके लिये उत्सुक रहते हैं—वे कपिल, नारद, दत्तात्रेय एवं सनकादि योगेश्‍वर भी उनके साथ आये थे॥ ५-६॥✎ 401

यह अर्थ श्लोक 5–6 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #401 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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