श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.30

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

ब्रह्म च ब्राह्मणांश्चैव यद्यूयं परिनिन्दथ।

सेतुं विधारणं पुंसामतः पाखण्डमाश्रिता॥ ३०

brahma ca brāhmaṇāṃścaiva yadyūyaṃ parinindatha|

setuṃ vidhāraṇaṃ puṃsāmataḥ pākhaṇḍamāśritā|| 30

अर्थ

अरे! तुमलोग जो धर्ममर्यादाके संस्थापक एवं वर्णाश्रमियोंके रक्षक वेद और ब्राह्मणोंकी निन्दा करते हो, इससे मालूम होता है तुमने पाखण्डका आश्रय ले रखा है॥ ३०॥

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