श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.8

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

प्राङ्निषण्णं मृडं दृष्ट्वा नामृष्यत्तदनादृतः।

उवाच वामं चक्षुर्भ्यामभिवीक्ष्य दहन्‍निव॥ ८

prāṅniṣaṇṇaṃ mṛḍaṃ dṛṣṭvā nāmṛṣyattadanādṛtaḥ|

uvāca vāmaṃ cakṣurbhyāmabhivīkṣya dahanniva|| 8

अर्थ

परन्तु महादेवजीको पहलेसे ही बैठा देख तथा उनसे अभ्युत्थानादिके रूपमें कुछ भी आदर न पाकर दक्ष उनका यह व्यवहार सहन न कर सके। उन्होंने उनकी ओर टेढ़ी नजरसे इस प्रकार देखा मानो उन्हें वे क्रोधाग्‍निसे जला डालेंगे। फिर कहने लगे—॥ ८॥

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