श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.20.2

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

एष तेऽकारषीद्भङ्गं हयमेधशतस्य ह।

क्षमापयत आत्मानममुष्य क्षन्तुमर्हसि॥ २

eṣa te'kāraṣīdbhaṅgaṃ hayamedhaśatasya ha|

kṣamāpayata ātmānamamuṣya kṣantumarhasi|| 2

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—राजन्! (इन्द्रने) तुम्हारे सौ अश्‍वमेध पूरे करनेके संकल्पमें विघ्न डाला है। अब ये तुमसे क्षमा चाहते हैं, तुम इन्हें क्षमा कर दो॥ २॥✎ 405

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #405 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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