नरदेव! जो श्रेष्ठ मानव साधु और सद्बुद्धि-सम्पन्न होते हैं, वे दूसरे जीवोंसे द्रोह नहीं करते; क्योंकि यह शरीर ही आत्मा नहीं है॥ ३॥
सुधियः साधवो लोके नरदेव नरोत्तमाः।
नाभिद्रुह्यन्ति भूतेभ्यो यर्हि नात्मा कलेवरम्॥ ३
नरदेव! जो श्रेष्ठ मानव साधु और सद्बुद्धि-सम्पन्न होते हैं, वे दूसरे जीवोंसे द्रोह नहीं करते; क्योंकि यह शरीर ही आत्मा नहीं है॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.20.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 500) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/20/3/