श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.19

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

शिशिरस्निग्धताराक्षः समैक्षत समन्ततः।

ऊचिवानिदमुर्वीशः सदः संहर्षयन्‍निव॥ १९

śiśirasnigdhatārākṣaḥ samaikṣata samantataḥ|

ūcivānidamurvīśaḥ sadaḥ saṃharṣayanniva|| 19

अर्थ

राजा पृथुने मानो सारी सभाको हर्षसे सराबोर करते हुए अपने शीतल एवं स्नेहपूर्ण नेत्रोंसे चारों ओर देखा और फिर अपना भाषण प्रारम्भ किया॥ १९॥✎ 1332

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1332 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नक्षत्र-मण्डलमें → नक्षत्रमण्डलमें

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