॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.21.20
चारु चित्रपदं श्लक्ष्णं मृष्टं गूढमविक्लवम्।
सर्वेषामुपकारार्थं तदा अनुवदन्निव॥ २०
cāru citrapadaṃ ślakṣṇaṃ mṛṣṭaṃ gūḍhamaviklavam|
sarveṣāmupakārārthaṃ tadā anuvadanniva|| 20
अर्थ
उनका भाषण अत्यन्त सुन्दर, विचित्र पदोंसे युक्त, स्पष्ट, मधुर, गम्भीर एवं निश्शंक था। मानो उस समय वे सबका उपकार करनेके लिये अपने अनुभवका ही अनुवाद कर रहे हों॥ २०॥✎ 1332