॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.21.42
यद्ब्रह्म नित्यं विरजं सनातनं
श्रद्धातपोमंगलमौनसंयमैः ।
समाधिना बिभ्रति हार्थदृष्टये
यत्रेदमादर्श इवावभासते॥ ४२
yadbrahma nityaṃ virajaṃ sanātanaṃ
śraddhātapomaṃgalamaunasaṃyamaiḥ |
samādhinā bibhrati hārthadṛṣṭaye
yatredamādarśa ivāvabhāsate|| 42
अर्थ
सभ्यगण! जिस प्रकार स्वच्छ दर्पणमें प्रतिबिम्बका भान होता है—उसी प्रकार जिससे इस सम्पूर्ण प्रपंचका ठीक-ठीक ज्ञान होता है, उस नित्य, शुद्ध और सनातन ब्रह्म (वेद)-को जो परमार्थ-तत्त्वकी उपलब्धिके लिये श्रद्धा, तप, मंगलमय आचरण, स्वाध्यायविरोधी वार्तालापके त्याग तथा संयम और समाधिके अभ्यासद्वारा धारण करते हैं, उन ब्राह्मणोंके चरणकमलोंकी धूलिको मैं आयुपर्यन्त अपने मुकुटपर धारण करूँ; क्योंकि उसे सर्वदा सिरपर चढ़ाते रहनेसे मनुष्यके सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण गुण उसकी सेवा करने लगते हैं॥ ४२-४३॥