श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.43

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

तेषामहं पादसरोजरेणु-

मार्या वहेयाधिकिरीटमाऽऽयुः।

यं नित्यदा बिभ्रत आशु पापं

नश्यत्यमुं सर्वगुणा भजन्ति॥ ४३

teṣāmahaṃ pādasarojareṇu-

māryā vaheyādhikirīṭamā''yuḥ|

yaṃ nityadā bibhrata āśu pāpaṃ

naśyatyamuṃ sarvaguṇā bhajanti|| 43

अर्थ

सभ्यगण! जिस प्रकार स्वच्छ दर्पणमें प्रतिबिम्बका भान होता है—उसी प्रकार जिससे इस सम्पूर्ण प्रपंचका ठीक-ठीक ज्ञान होता है, उस नित्य, शुद्ध और सनातन ब्रह्म (वेद)-को जो परमार्थ-तत्त्वकी उपलब्धिके लिये श्रद्धा, तप, मंगलमय आचरण, स्वाध्यायविरोधी वार्तालापके त्याग तथा संयम और समाधिके अभ्यासद्वारा धारण करते हैं, उन ब्राह्मणोंके चरणकमलोंकी धूलिको मैं आयुपर्यन्त अपने मुकुटपर धारण करूँ; क्योंकि उसे सर्वदा सिरपर चढ़ाते रहनेसे मनुष्यके सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण गुण उसकी सेवा करने लगते हैं॥ ४२-४३॥

यह अर्थ श्लोक 42–43 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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