॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.21.44
गुणायनं शीलधनं कृतज्ञं
वृद्धाश्रयं संवृणतेऽनु सम्पदः।
प्रसीदतां ब्रह्मकुलं गवां च
जनार्दनः सानुचरश्च मह्यम्॥ ४४
guṇāyanaṃ śīladhanaṃ kṛtajñaṃ
vṛddhāśrayaṃ saṃvṛṇate'nu sampadaḥ|
prasīdatāṃ brahmakulaṃ gavāṃ ca
janārdanaḥ sānucaraśca mahyam|| 44
अर्थ
उस गुणवान्, शीलसम्पन्न, कृतज्ञ और गुरुजनोंकी सेवा करनेवाले पुरुषके पास सारी सम्पदाएँ अपने-आप आ जाती हैं। अतः मेरी तो यही अभिलाषा है कि ब्राह्मणकुल, गोवंश और भक्तोंके सहित श्रीभगवान् मुझपर सदा प्रसन्न रहें॥ ४४॥