श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.6

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

पूजितः पूजयामास तत्र तत्र महायशाः।

पौरांजानपदांस्तांस्तान् प्रीतः प्रियवरप्रदः॥ ६

pūjitaḥ pūjayāmāsa tatra tatra mahāyaśāḥ|

paurāṃjānapadāṃstāṃstān prītaḥ priyavarapradaḥ|| 6

अर्थ

मार्गमें जहाँ-तहाँ पुरवासी और देशवासियोंने उनका अभिनन्दन किया। परम यशस्वी महाराजने भी उन्हें प्रसन्‍नतापूर्वक अभीष्ट वर देकर सन्तुष्ट किया॥ ६॥

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