सूतजी कहते हैं—मुनिवर शौनकजी! इस प्रकार भगवान् मैत्रेयके मुखसे आदिराज पृथुका अनेक प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न और गुणवानोंद्वारा प्रशंसित विस्तृत सुयश सुनकर परम भागवत विदुरजीने उनका अभिनन्दन करते हुए कहा॥ ८॥✎ 1605
तदादिराजस्य यशो विजृम्भितं
गुणैरशेषैर्गुणवत्सभाजितम् ।
क्षत्ता महाभागवतः सदस्पते
कौषारविं प्राह गृणन्तमर्चयन्॥ ८
सूतजी कहते हैं—मुनिवर शौनकजी! इस प्रकार भगवान् मैत्रेयके मुखसे आदिराज पृथुका अनेक प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न और गुणवानोंद्वारा प्रशंसित विस्तृत सुयश सुनकर परम भागवत विदुरजीने उनका अभिनन्दन करते हुए कहा॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.21.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 506) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/8/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—तदाधिरा०।
(मुद्रित पृष्ठ 506)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1605 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विदुरजी- ने → विदुरजीने